
फर्रुखाबाद। देश के प्रथम मुस्लिम देहदानी एवं समाजसेवी डॉ0 अरशद मंसूरी बताते हैं रमज़ान का पवित्र महीना सब्र, इबादत और आत्मसंयम का संदेश देता है। इस माह में रोज़ा रखने की शुरुआत सहरी से होती है, जो केवल एक भोजन नहीं बल्कि एक सुन्नत और सेहत का अहम आधार है। सहरी करना इस्लाम में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसमें बरकत बताई गई है।
सहरी रोज़ेदार को दिनभर की इबादत और रोज़मर्रा के कामों के लिए ऊर्जा प्रदान करती है। सही समय पर और संतुलित सहरी करने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती और कमजोरी से बचाव होता है। सहरी में हल्का, पौष्टिक और सुपाच्य भोजन जैसे दाल, दूध, फल, हरी सब्ज़ियां और पर्याप्त पानी शामिल करना चाहिए।
धार्मिक दृष्टि से सहरी अल्लाह की रहमत और बरकत का ज़रिया है। यह रोज़ेदार को अनुशासन सिखाती है और अल्लाह की इबादत के लिए तैयार करती है। सहरी के वक्त की गई दुआएँ विशेष रूप से स्वीकार होती हैं।
अंत में डॉ0 अरशद कहते है रमज़ान में सहरी को छोड़ना नहीं चाहिए। यह न केवल रोज़े को आसान बनाती है, बल्कि शारीरिक और आत्मिक मजबूती भी प्रदान करती है। सहरी के साथ रोज़े की शुरुआत करना रमज़ान की रूहानी फिज़ा को और भी पवित्र बना देता है।



