
फर्रुखाबाद यूथ कांग्रेस जिलाध्यक्ष अम्मार अली जैदी बताते है। माह-ए-रमज़ान इस्लाम का सबसे पवित्र और मुक़द्दस महीना है। यह महीना अल्लाह की रहमत (दया), बरकत (नेमतों की बढ़ोतरी) और मग़फ़िरत (गुनाहों की माफी) का पैग़ाम लेकर आता है। रमज़ान केवल रोज़ा रखने का नाम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, इबादत, इंसानियत और सामाजिक ज़िम्मेदारियों को निभाने का अवसर भी है।
रमज़ान का पहला अशरा रहमत का होता है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों पर विशेष कृपा करता है। दूसरा अशरा मग़फ़िरत का माना जाता है, जहाँ सच्चे दिल से तौबा करने वालों के गुनाह माफ़ किए जाते हैं। तीसरा अशरा जहन्नम से निजात का होता है, जो हमें आत्मशुद्धि और नेक रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है।
इस पवित्र महीने में रोज़ेदार भूख-प्यास सहकर न सिर्फ़ अपने सब्र की परीक्षा देता है, बल्कि ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के दर्द को भी महसूस करता है। यही भावना समाज में बराबरी, भाईचारे और आपसी मोहब्बत को मज़बूत करती है। रमज़ान हमें सिखाता है कि हम अपने व्यवहार में सच्चाई, ईमानदारी और सहानुभूति को अपनाएँ।
नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, तरावीह और दुआओं के ज़रिये इंसान अपने रब के और क़रीब होता है। यह महीना आत्ममंथन का भी है—अपने अंदर की बुराइयों को छोड़कर अच्छाइयों को अपनाने का संकल्प लेने का समय है।
आज के दौर में, जब समाज कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है, रमज़ान का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। आपसी सौहार्द, भाईचारा और सामाजिक एकता ही किसी भी समाज की असली ताक़त होती है। हमें चाहिए कि हम इस महीने में नफ़रत, भेदभाव और हिंसा से दूर रहकर मोहब्बत और अमन का रास्ता अपनाएँ।
अंत में, अम्मार अली जैदी कहते है तमाम देशवासियों, विशेषकर फर्रुखाबाद के लोगों से अपील करता हूँ कि रमज़ान के इस पाक महीने में ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करें, ज़रूरतमंदों की मदद करें और समाज में अमन-चैन बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाएँ।
अम्मार अली जैदी अध्यक्ष, यूथ कांग्रेस फर्रुखाबाद


