
समाजसेवी वारिस अली मिन्ना खा बताते है रमज़ान इस्लाम का सबसे मुक़द्दस महीना है, और इसकी सबसे बड़ी पहचान क़ुरआन से जुड़ी हुई है। यह वही पाक महीना है जिसमें अल्लाह ने इंसानियत की हिदायत के लिए क़ुरआन मजीद नाज़िल फरमाया। इसी वजह से रमज़ान को “शहरुल-क़ुरआन” यानी क़ुरआन का महीना कहा जाता है।क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फरमाता है कि रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो इंसानों के लिए मार्गदर्शन है और सही-गलत में फर्क बताने वाला है। इससे साफ़ जाहिर होता है कि रोज़ा और क़ुरआन का रिश्ता सिर्फ़ इबादत तक सीमित नहीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी को संवारने वाला है।

रमज़ान इस्लाम का सबसे मुक़द्दस महीना है, और इसकी सबसे बड़ी पहचान क़ुरआन से जुड़ी हुई है। यह वही पाक महीना है जिसमें अल्लाह ने इंसानियत की हिदायत के लिए क़ुरआन मजीद नाज़िल फरमाया। इसी वजह से रमज़ान को “शहरुल-क़ुरआन” यानी क़ुरआन का महीना कहा जाता है।
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फरमाता है कि रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो इंसानों के लिए मार्गदर्शन है और सही-गलत में फर्क बताने वाला है। इससे साफ़ जाहिर होता है कि रोज़ा और क़ुरआन का रिश्ता सिर्फ़ इबादत तक सीमित नहीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी को संवारने वाला है।

क़ुरआन के नुज़ूल का महीना
रमज़ान की एक ख़ास रात, जिसे लैलतुल क़द्र कहा जाता है, उसी रात क़ुरआन का नुज़ूल शुरू हुआ। यह रात हज़ार महीनों से बेहतर बताई गई है। इस रात में क़ुरआन की तिलावत, समझ और उस पर अमल करने का सवाब कई गुना बढ़ जाता है।
रोज़ा और क़ुरआन: दो सिफ़ारिश करने वाले
हदीस में आता है कि क़यामत के दिन रोज़ा और क़ुरआन बंदे की सिफ़ारिश करेंगे। रोज़ा कहेगा कि मैंने इसे खाने-पीने और इच्छाओं से रोके रखा, और क़ुरआन कहेगा कि मैंने इसे रातों में जगाए रखा। दोनों की सिफ़ारिश कबूल की जाएगी। इससे रमज़ान में क़ुरआन से जुड़ने की अहमियत और बढ़ जाती है।
रमज़ान में तिलावत और तदब्बुर
रमज़ान में क़ुरआन की तिलावत का खास एहतमाम किया जाता है। तरावीह की नमाज़ में पूरा क़ुरआन सुना जाता है, ताकि मुसलमान अल्लाह के कलाम को सुनें, समझें और उससे जुड़ें। मगर सिर्फ़ पढ़ना ही काफी नहीं, बल्कि उसके अर्थ पर गौर करना और उसकी शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी में उतारना ही असली मकसद है।
अमल की किताब
क़ुरआन केवल पढ़ने या सवाब कमाने की किताब नहीं, बल्कि अमल की किताब है। रमज़ान हमें सिखाता है कि जैसे हम दिन भर रोज़ा रखकर सब्र और तक़वा सीखते हैं, वैसे ही क़ुरआन के बताए रास्ते पर चलकर अपनी सोच, किरदार और समाज को बेहतर बनाएं। रमज़ान और क़ुरआन का रिश्ता रूह और जिस्म जैसा है। रमज़ान क़ुरआन से जुड़ने का सबसे बेहतरीन मौका है। अगर हम इस महीने में क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ें ही नहीं, बल्कि समझें और अपनी ज़िंदगी में उतारें, तो यही रमज़ान की असली कामयाबी होगी। रमज़ान की एक ख़ास रात, जिसे लैलतुल क़द्र कहा जाता है, उसी रात क़ुरआन का नुज़ूल शुरू हुआ। यह रात हज़ार महीनों से बेहतर बताई गई है। इस रात में क़ुरआन की तिलावत, समझ और उस पर अमल करने का सवाब कई गुना बढ़ जाता है।रोज़ा और क़ुरआन: दो सिफ़ारिश करने वालेहदीस में आता है कि क़यामत के दिन रोज़ा और क़ुरआन बंदे की सिफ़ारिश करेंगे। रोज़ा कहेगा कि मैंने इसे खाने-पीने और इच्छाओं से रोके रखा, और क़ुरआन कहेगा कि मैंने इसे रातों में जगाए रखा। दोनों की सिफ़ारिश कबूल की जाएगी। इससे रमज़ान में क़ुरआन से जुड़ने की अहमियत और बढ़ जाती है। रमज़ान में तिलावत और तदब्बुर रमज़ान में क़ुरआन की तिलावत का खास एहतमाम किया जाता है। तरावीह की नमाज़ में पूरा क़ुरआन सुना जाता है, ताकि मुसलमान अल्लाह के कलाम को सुनें, समझें और उससे जुड़ें। मगर सिर्फ़ पढ़ना ही काफी नहीं, बल्कि उसके अर्थ पर गौर करना और उसकी शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी में उतारना ही असली मकसद है। अमल की किताब क़ुरआन केवल पढ़ने या सवाब कमाने की किताब नहीं, बल्कि अमल की किताब है। रमज़ान हमें सिखाता है कि जैसे हम दिन भर रोज़ा रखकर सब्र और तक़वा सीखते हैं, वैसे ही क़ुरआन के बताए रास्ते पर चलकर अपनी सोच, किरदार और समाज को बेहतर बनाएं। रमजान और क़ुरआन का रिश्ता रूह और जिस्म जैसा है। अंत में वारिस अली मिन्ना खान कहते है रमज़ान क़ुरआन से जुड़ने का सबसे बेहतरीन मौका है। अगर हम इस महीने में क़ुरआन को सिर्फ़ पढ़ें ही नहीं, बल्कि समझें और अपनी ज़िंदगी में उतारें, तो यही रमज़ान की असली कामयाबी होगी।


