
हिलाल शफीकी (प्रदेश सचिव सोशल मीडिया विभाग उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी),बताते है रमज़ान का पवित्र महीना तीन अशरों में विभाजित होता है, जिनमें पहला अशरा रहमत (दया) का होता है। यह अशरा अल्लाह की असीम कृपा और मेहरबानी का संदेश लेकर आता है। इस दौरान रोज़ेदारों पर अल्लाह की खास रहमत नाज़िल होती है, और बंदों को अपने गुनाहों से तौबा कर सच्चे दिल से उसकी ओर लौटने का अवसर मिलता है।

पहले अशरे में रोज़ा केवल भूख-प्यास से रुकने का नाम नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, सोच और आचरण को सुधारने का प्रशिक्षण है। इस समय नमाज़ की पाबंदी, क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र-अज़कार और दुआओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है। गरीबों, ज़रूरतमंदों और बेसहारा लोगों की मदद कर के इंसान अल्लाह की रहमत का हक़दार बनता है।

रहमत का यह अशरा हमें सिखाता है कि हम अपने दिलों को नफ़रत, ईर्ष्या और ग़लतियों से पाक करें और प्रेम, सहनशीलता व भाईचारे को अपनाएँ। अंत में हिलाल शफीकी कहते है जो इंसान इस अशरे में सच्ची नीयत से इबादत करता है, अल्लाह उसकी दुआओं को क़ुबूल फ़रमाता है और उसके दिल में सुकून उतार देता है।यही रमज़ान के पहले अशरे का पैग़ाम है—रहमत, माफ़ी और इंसानियत की राह पर चलना।



