
समाजसेवी एवं राज्य समन्वयक अधिकारी श्रम विभाग सैयद रिज़वान अली बताते है रोज़ा केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि यह इंसान की रूहानी तरबियत और आत्मसंयम की बेहतरीन इबादत है। इस्लाम में रोज़े का मक़सद इंसान के भीतर सब्र, तक़वा और इंसानियत के जज़्बे को मज़बूत करना है। माह-ए-रमज़ान में मुसलमान अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं और नेकी की राह पर आगे बढ़ते हैं।
रोज़ा इंसान को सिखाता है कि वह कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखे। भूख और प्यास सहते हुए रोज़ेदार अपने नफ़्स पर काबू पाता है और ग़लत बातों से दूर रहता है। यह अभ्यास जीवन के हर पहलू में संयम और संतुलन लाने में मदद करता है।
इस पाक महीने में इबादत के साथ-साथ समाज सेवा की भी विशेष अहमियत है। रोज़ा हमें ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की तकलीफ़ का एहसास कराता है, जिससे दिल में हमदर्दी और भाईचारे का जज़्बा पैदा होता है। ज़कात, सदक़ा और इफ़्तार के ज़रिये समाज में आपसी मोहब्बत और बराबरी का पैग़ाम फैलता है।
आज के दौर में, जब तनाव और असहिष्णुता बढ़ रही है, रोज़ा आत्मसंयम और शांति का सबक देता है। यह हमें अपने किरदार को बेहतर बनाने, बुराइयों से दूर रहने और अच्छाइयों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
श्री रिजवान अली अंत में कहते है। रोज़ा इंसान को न सिर्फ़ अल्लाह के क़रीब लाता है, बल्कि उसे एक बेहतर इंसान बनने की राह भी दिखाता है। यही रोज़े की असल रूह और मक़सद है—सब्र, आत्मसंयम और इंसानियत।



