
पूर्व चेयरमैन प्रत्याशी व समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव हाजी अहमद अंसारी बताते है रमज़ान का महीना रहमत, मग़फिरत और निजात का पैग़ाम लेकर आता है। यह महीना सिर्फ़ भूखे-प्यासे रहने का नहीं, बल्कि अपने नफ़्स पर क़ाबू पाने, सोच और व्यवहार को बेहतर बनाने का नाम है। रमज़ान की रूह सब्र में छुपी है, क्योंकि बिना सब्र के रोज़ा अधूरा रह जाता है।

सब्र का अर्थ केवल भूख-प्यास सहना नहीं, बल्कि बुरी बातों से बचना, ग़ुस्से पर क़ाबू रखना और दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना भी है। रोज़ा इंसान को सिखाता है कि वह हर हाल में अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहे। जब इंसान हलाल चीज़ों से भी तय समय तक रुक सकता है, तो हराम से बचना उसके लिए और आसान हो जाता है। रमज़ान में सब्र इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यही सब्र इंसान को अल्लाह के क़रीब करता है। रोज़ेदार जब भूख की हालत में भी झूठ, ग़ीबत, लड़ाई-झगड़े और बदज़बानी से बचता है, तो उसका रोज़ा नूर बन जाता है। हदीस में आया है कि सब्र करने वालों का अज्र बिना हिसाब के दिया जाएगा, और रमज़ान सब्र की सबसे बड़ी ट्रेनिंग है। सब्र समाज में भी सकारात्मक बदलाव लाता है। रमज़ान में इंसान ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की तकलीफ़ को महसूस करता है, जिससे उसके दिल में हमदर्दी और रहम पैदा होता है। यही सब्र इंसान को ज़कात, सदक़ा और ख़ैरात की तरफ़ बढ़ाता है, जो समाज को मजबूत बनाता है।

आख़िर में हाजी अहमद अंसारी कहते है कि रमज़ान में सब्र रोज़े की जान है। जो इंसान सब्र के साथ रोज़ा रखता है, वही रमज़ान की असली बरकतों को पाता है। हमें चाहिए कि इस मुक़द्दस महीने में अपने अख़लाक़ को बेहतर बनाएं, ग़ुस्से और नफ़्स पर क़ाबू रखें और सब्र को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं, ताकि रमज़ान हमारे लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी का ज़रिया बने।


