
सेवा समिति फर्रुखाबाद रजि० के नगर प्रभारी आदिल हुसैन बताते है रमज़ान का महीना रहमत, मग़फ़िरत और निजात का पैग़ाम लेकर आता है। यह महीना सिर्फ़ भूखे-प्यासे रहने का नहीं, बल्कि अपने पूरे वजूद—सोच, ज़ुबान, नज़र और आमाल—को पाक करने का समय है। आज के डिजिटल दौर में जहाँ मोबाइल और सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं, वहीं रमज़ान हमें यह सिखाता है कि हर चीज़ का इस्तेमाल हद और मक़सद के साथ होना चाहिए।

सोशल मीडिया अपने आप में न अच्छा है न बुरा, बल्कि उसका इस्तेमाल उसे अच्छा या बुरा बनाता है। रमज़ान में बेवजह की स्क्रॉलिंग, फ़ालतू वीडियो, झूठी ख़बरें, बहस-बाज़ी और नफ़रत फैलाने वाला कंटेंट रोज़े की रूहानियत को नुक़सान पहुँचाता है। रोज़ा सिर्फ़ पेट का नहीं होता, बल्कि आँखों, कानों और उंगलियों का भी होता है। जो चीज़ दिल को ग़ाफ़िल करे और इबादत से दूर ले जाए, उससे बचना ही असल संयम है।

इस मुक़द्दस महीने में सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल यह हो सकता है कि हम दीन की अच्छी बातें साझा करें, सब्र, अख़लाक़ और भाईचारे का पैग़ाम दें, ज़रूरतमंदों की मदद से जुड़ी जानकारी फैलाएँ और रिश्तों में मोहब्बत बढ़ाने वाले अल्फ़ाज़ लिखें। किसी की तौहीन, मज़ाक़, तंज़ या बेवजह की बहस से परहेज़ करना रमज़ान की रूह के मुताबिक़ है।रमज़ान हमें वक़्त की क़द्र सिखाता है। जो समय हम घंटों मोबाइल पर ज़ाया कर देते हैं, वही समय क़ुरआन की तिलावत, दुआ, ज़िक्र और ख़ामोशी की फ़िक्र में लगाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर लिमिट तय करना, नोटिफ़िकेशन कम करना और बेकार ऐप्स से दूरी बनाना एक अच्छा क़दम हो सकता है।

अंत में आदिल हुसैन कहते है असल बात यह है कि रमज़ान में हमारी डिजिटल ज़िंदगी भी इबादत के रंग में रंगी हो। कम इस्तेमाल, सही इस्तेमाल और नेक मक़सद के लिए इस्तेमाल यही सोशल मीडिया पर संयम है। जब इबादत और डिजिटल दुनिया के बीच संतुलन बन जाता है, तभी रमज़ान हमारी ज़िंदगी को सच में बेहतर और पाक बनाता है।


