
समाजसेवी आकिल खाँ बताते है रमज़ान का मुबारक महीना तीन अशरों में तक़सीम किया गया है। पहला अशरा रहमत का होता है, दूसरा अशरा मग़फ़िरत यानी गुनाहों की माफी का और तीसरा अशरा जहन्नम से निजात का। रमज़ान का दूसरा अशरा मुसलमानों के लिए खास तौर पर अपने गुनाहों से तौबा करने और अल्लाह से माफी मांगने का बेहतरीन मौका होता है।

आकिल खाँ बताते हैं कि इस अशरे में बंदा अगर सच्चे दिल से अपने किए हुए गुनाहों पर शर्मिंदा होकर अल्लाह से तौबा करे तो अल्लाह तआला अपनी रहमत से उसके गुनाह माफ फरमा देता है। इस दौरान इबादत, नमाज़, तिलावत-ए-कुरआन, ज़िक्र और दुआओं में ज्यादा वक्त गुजारना चाहिए।रमज़ान का यह दूसरा अशरा हमें यह पैग़ाम देता है कि इंसान अपनी गलतियों को पहचानकर अल्लाह से माफी मांगे और अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने की कोशिश करे। अल्लाह तआला बेहद मेहरबान और रहम करने वाला है, वह अपने बंदों की सच्ची तौबा को जरूर कबूल फरमाता है।

इस अशरे में खास तौर पर यह दुआ पढ़नी चाहिए—“अस्तग़फ़िरुल्लाह रब्बी मिन कुल्लि ज़म्बिन व अतूबु इलैह।”यानी “मैं अपने रब से हर गुनाह की माफी मांगता हूं और उसी की तरफ तौबा करता हूं।


अंत में आक़िल खा कहते है रमज़ान का दूसरा अशरा हमें यह सिखाता है कि इंसान अपनी जिंदगी को गुनाहों से पाक करके अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत हासिल करे, ताकि आख़िरत में कामयाबी मिल सके। अगर इस अशरे में सच्चे दिल से तौबा और इस्तिग़फ़ार किया जाए तो यह इंसान की जिंदगी को बदल सकता है।


