
फर्रुखाबाद। मुमताज बेगम मंसूरी, पूर्व प्रत्याशी अध्यक्ष नगर पालिका परिषद फर्रुखाबाद बताती है इस्लाम में इफ्तार केवल रोज़ा खोलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह एक महान सुन्नत और सामाजिक भाईचारे का जीवंत प्रतीक है। रमज़ान के पवित्र महीने में सूरज ढलते ही जब रोज़ेदार अल्लाह का नाम लेकर इफ्तार करते हैं, तो वह पल इबादत, संयम और इंसानियत के संगम को दर्शाता है।
सुन्नत के रूप में इफ्तार पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद ﷺ ने सादा और समय पर इफ्तार करने की शिक्षा दी। खजूर और पानी से इफ्तार करना न सिर्फ़ सुन्नत है, बल्कि यह संयम और सादगी का संदेश भी देता है। इस सुन्नत पर अमल करते हुए रोज़ेदार अल्लाह का शुक्र अदा करता है और आत्मिक शांति प्राप्त करता है।
सामाजिक भाईचारे की मिसाल इफ्तार की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह समाज को जोड़ता है। मस्जिदों, घरों और सार्वजनिक स्थानों पर सामूहिक इफ्तार का आयोजन होता है, जहाँ अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, सभी एक ही दस्तरख़्वान पर बैठते हैं। यह समानता, आपसी मोहब्बत और भाईचारे को मज़बूत करता है।
सेवा और सहानुभूति का संदेश रमज़ान में इफ्तार कराना बहुत बड़ा सवाब माना गया है। ज़रूरतमंदों, मुसाफ़िरों और पड़ोसियों के साथ इफ्तार साझा करना इंसानियत की बेहतरीन मिसाल है। इससे दिलों में करुणा, सहयोग और सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना पैदा होती है।
अंत में मुमताज़ बेगम मंसूरी कहती है इफ्तार हमें सिखाता है कि इबादत केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक भी होती है। यह सुन्नत हमें सादगी, साझेदारी और भाईचारे के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है। अगर हम इफ्तार की असल रूह को समझ लें, तो समाज में प्रेम, शांति और एकता अपने आप मज़बूत हो जाएगी।



